कितना अच्छा लगता है
जयपुर की सड़कों पर
जाना
रोज टहलने
गरमी के मौसम में तड़के
थोड़े से अंधियारे में
सड़क किनारे
बिछी खाट पर
सोते हैं जन
रंग बिरंगी कथरी ओढ़े
टुकड़ों-टुकड़ों गुथी कला के
सहज फलक से
धीमे-धीमे बहती है पुरवा
अमलतास के
स्वर्ण घुन्घुरुओं को झनकाती
खिले हुए
गुलमोहरों से ढकी
हलचल रहित स्तब्ध वधूटी जैसी
निर्मल सड़कें
शांत !!
घने यातायातों से दूर
ऊँट गाड़ी का सहज गुजरना
धीरे-धीरे
झरती हुई नीम के नीचे
कितना अच्छा लगता है
सूरज के आने से पहले
घने शहर में
कोलाहल भर जाने से पहले।
सोजन्य से - आलोक जैन के "दोस्त" की ओर से
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Saturday, July 14, 2007
Sunday, July 8, 2007
बारिश
बारिश में टपकती बूंदें
धरती को ललचाती बूंदें
अब थोडी थम गयी हैं
रस्ते के ख्ड्डों में जम गयी हैं
आसमान ने जब धरती को देखा होगा
उसके दिल में इसे छूने का अरमान जागा होगा
मेघ मल्हार के राग गाती बूंदें
अपने प्रियतम को आगोश में लेटी बूंदें
इन बूंदों को देख कर मन रोमानी हो जाता है
इसे धरती में युं मिलते देख, अपना प्रियतम याद आता है
जाने कहां है, और क्या कर रहा है
शायद मेरी तरह बेठ कर, याद मुझे कर रहा है
ना किया हो, इसकी कोई वजह नहीं
उसकी याद ही है बारिश की वजह भी
सोजन्य से - आलोक जैन के अच्छे मित्र
धरती को ललचाती बूंदें
अब थोडी थम गयी हैं
रस्ते के ख्ड्डों में जम गयी हैं
आसमान ने जब धरती को देखा होगा
उसके दिल में इसे छूने का अरमान जागा होगा
मेघ मल्हार के राग गाती बूंदें
अपने प्रियतम को आगोश में लेटी बूंदें
इन बूंदों को देख कर मन रोमानी हो जाता है
इसे धरती में युं मिलते देख, अपना प्रियतम याद आता है
जाने कहां है, और क्या कर रहा है
शायद मेरी तरह बेठ कर, याद मुझे कर रहा है
ना किया हो, इसकी कोई वजह नहीं
उसकी याद ही है बारिश की वजह भी
सोजन्य से - आलोक जैन के अच्छे मित्र
Thursday, July 5, 2007
हमारे प्यारे कालेज के दिन
यह डिग्री भी ले लो, ये नौकरी भी ले लो,
भले छीन लो मुझ से "यु एस ए" का वीसा ...........
मगर मुझ को लौटा दो कालेज का कैंटीन,
वो चाय का पानी वो तीखा समोसा ..........
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना,
वो प्रोजेक्ट की खातिर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर में दोस्तों की प्रोक्सी लगाना
वो सर को चिढाना, वो हवाई जहाज उडाना,
वो सब्मीशन की रातों को जगना जगाना,
वो जुबानी की कहानी, वो प्रेक्टिकल का किस्सा .....
बिमारी का रीज़न दे के समय बढाना,
वो दूसरों के assignments को अपना बनाना,
वो सेमीनार के दिन पैरों का chhatpatanna,
वो वर्कशोप में दिन रात पसीना बहाना,
वो परीक्षा के दिन का बेचैन माहौल,
पर वो माँ का विश्वास - टीचर का भरोसा .....
वो पेड़ों के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों में ड्राइंग शीट्स बनाना,
वो परीक्षाओं के आख़री दिन थीएटर में जाना,
वो भोले से फ्रेशेर्स को हमेशा सताना
विदाउट एनी रीजन कॉमन ऑफ़ पे जाना,
टेस्ट के वक़्त टेबल में किताबों को रखना,
इसी तरह टीचर्स को देना झांसा ........
कालेज की सबसे पुरानी निशानी,
वो चाय वाला जिसे सारे कहते थे ... जानी ,
वो जानी के हाथों की चाय मीठी,
वो चुपके से जरनल में भेजी हुई चिट्ठी,
वो पढ़ते ही चिट्ठी उसका भड़कना,
वो चहरे की लाली वो आंखों का गुस्सा .....
कालेज की वो सारी लम्बी सी रातें,
वो दोस्तों से कैंटीन में प्यारी सी बातें,
वो गेद्रिंग के दिन का लड़ना झगड़ना,
वो लड़कियों का यूँही हमेशा अकड़ना,
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई,
वो कालेज, वो बातें, वो शरारतें वो जवानी ...
काश हम फिर दोहरा सकते कहानी ......
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी ....
सोजन्य से: राजीव सक्सेना के मित्र
भले छीन लो मुझ से "यु एस ए" का वीसा ...........
मगर मुझ को लौटा दो कालेज का कैंटीन,
वो चाय का पानी वो तीखा समोसा ..........
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना,
वो प्रोजेक्ट की खातिर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर में दोस्तों की प्रोक्सी लगाना
वो सर को चिढाना, वो हवाई जहाज उडाना,
वो सब्मीशन की रातों को जगना जगाना,
वो जुबानी की कहानी, वो प्रेक्टिकल का किस्सा .....
बिमारी का रीज़न दे के समय बढाना,
वो दूसरों के assignments को अपना बनाना,
वो सेमीनार के दिन पैरों का chhatpatanna,
वो वर्कशोप में दिन रात पसीना बहाना,
वो परीक्षा के दिन का बेचैन माहौल,
पर वो माँ का विश्वास - टीचर का भरोसा .....
वो पेड़ों के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों में ड्राइंग शीट्स बनाना,
वो परीक्षाओं के आख़री दिन थीएटर में जाना,
वो भोले से फ्रेशेर्स को हमेशा सताना
विदाउट एनी रीजन कॉमन ऑफ़ पे जाना,
टेस्ट के वक़्त टेबल में किताबों को रखना,
इसी तरह टीचर्स को देना झांसा ........
कालेज की सबसे पुरानी निशानी,
वो चाय वाला जिसे सारे कहते थे ... जानी ,
वो जानी के हाथों की चाय मीठी,
वो चुपके से जरनल में भेजी हुई चिट्ठी,
वो पढ़ते ही चिट्ठी उसका भड़कना,
वो चहरे की लाली वो आंखों का गुस्सा .....
कालेज की वो सारी लम्बी सी रातें,
वो दोस्तों से कैंटीन में प्यारी सी बातें,
वो गेद्रिंग के दिन का लड़ना झगड़ना,
वो लड़कियों का यूँही हमेशा अकड़ना,
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई,
वो कालेज, वो बातें, वो शरारतें वो जवानी ...
काश हम फिर दोहरा सकते कहानी ......
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी ....
सोजन्य से: राजीव सक्सेना के मित्र
Wednesday, July 4, 2007
बल्ली की सेहत का राज !!
सेहत का राज !
प्रेमराज के हाथ की दाल !!
बहुत सीक्रेट है बात !
बनाता था खूब तरहके के साथ !!
डालता था खूब मिर्ची, धनिया ओर घी !
ओ ये छड यार, होर दसन में की (लिटिल पंजाबी) !!
अफ़सोस खुद ही खा जाता था सारी !
बस कभी कभी ही जगती थी किस्मत हमारी !!
लोयड यार बीस साल बाद भी तुझे समझ नहीं आई !
सेहत क्या ख़ाक बनेगी, अगर प्रेमराज के हाथ की दाल ही नहीं खायी !!
बलविंदर सिंह "बल्ली"
प्रेमराज के हाथ की दाल !!
बहुत सीक्रेट है बात !
बनाता था खूब तरहके के साथ !!
डालता था खूब मिर्ची, धनिया ओर घी !
ओ ये छड यार, होर दसन में की (लिटिल पंजाबी) !!
अफ़सोस खुद ही खा जाता था सारी !
बस कभी कभी ही जगती थी किस्मत हमारी !!
लोयड यार बीस साल बाद भी तुझे समझ नहीं आई !
सेहत क्या ख़ाक बनेगी, अगर प्रेमराज के हाथ की दाल ही नहीं खायी !!
बलविंदर सिंह "बल्ली"
Monday, July 2, 2007
गरमी के दिन और पहाड़ों का सफ़र
हम थे तुम थे साथ नदी थी
पर्वत पर आकाश टिका था
झरनों की गति मन हरती थी
रुकी रुकी कोहरे की बाहें
हरयाली की शीतल छांहे
रिमझिम से भीगे मौसम में
सन्नाटे की धुन बजती थी
मनिमुक्ता से सांझ सवेरे
धुली धुली दोपहर को घेरे
हाथों को बादल छूते थे
बूंदों में बारिश झरती थी
गहरी घाटी ऊँचे धाम
मोड़ मन्नतें शालिग्राम
झरझर कर झरते संगम पर
खेतों से लिपटी बस्ती थी
गरम हवा का नाम नहीं था
कहीँ उमस का ठाम नहीं था
खेतों सजी धान की फसलें
अम्बर तक सीढ़ी बुनती थी
सौजन्य से: आलोक जैन के अच्छे मित्र
पर्वत पर आकाश टिका था
झरनों की गति मन हरती थी
रुकी रुकी कोहरे की बाहें
हरयाली की शीतल छांहे
रिमझिम से भीगे मौसम में
सन्नाटे की धुन बजती थी
मनिमुक्ता से सांझ सवेरे
धुली धुली दोपहर को घेरे
हाथों को बादल छूते थे
बूंदों में बारिश झरती थी
गहरी घाटी ऊँचे धाम
मोड़ मन्नतें शालिग्राम
झरझर कर झरते संगम पर
खेतों से लिपटी बस्ती थी
गरम हवा का नाम नहीं था
कहीँ उमस का ठाम नहीं था
खेतों सजी धान की फसलें
अम्बर तक सीढ़ी बुनती थी
सौजन्य से: आलोक जैन के अच्छे मित्र
तुम साथ साथ हो ना ?
कभी मिलना कभी खोना
कभी साथ साथ चलना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कहीँ भीड़, है घनेरी
कहीँ राह है अँधेरी
कहीँ रौशनी की खुशियाँ
कहीँ मछलियाँ सुन्हेरी
कभी सीढ़ियों पर चढ़ना
कभी ढाल पर फिसलना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कभी चर्खियों के चक्कर
कहीँ शोर बाजे सा
कुछ फिकरे और धक्के
कुछ मुफ़्त बँटा सा
रंगीन बुलबुलों सा
कभी आसमान मैं उड़ना
यही है जिंदगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कहीँ मौत का कुँआ है
कहीँ मश्खरों के जादू
कभी ढ़ेर सारे गुब्बारे
कहीँ मोगरे की खुशबू
कभी जिंदगी को सिलना
कभी दर्द को पिरोना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
आलोक जैन
कृपया ध्यान दें: इस में मेरी भावना कुछ अपने पुराने दोस्तों और दिनों को याद करके लिखी गयी थी। मगर आप लोग यह नहीं सोचना कि मैं कवि बन गया हूँ।
कभी साथ साथ चलना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कहीँ भीड़, है घनेरी
कहीँ राह है अँधेरी
कहीँ रौशनी की खुशियाँ
कहीँ मछलियाँ सुन्हेरी
कभी सीढ़ियों पर चढ़ना
कभी ढाल पर फिसलना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कभी चर्खियों के चक्कर
कहीँ शोर बाजे सा
कुछ फिकरे और धक्के
कुछ मुफ़्त बँटा सा
रंगीन बुलबुलों सा
कभी आसमान मैं उड़ना
यही है जिंदगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
कहीँ मौत का कुँआ है
कहीँ मश्खरों के जादू
कभी ढ़ेर सारे गुब्बारे
कहीँ मोगरे की खुशबू
कभी जिंदगी को सिलना
कभी दर्द को पिरोना
यही है जिन्दगी का मेला
तुम साथ साथ हो ना ?
आलोक जैन
कृपया ध्यान दें: इस में मेरी भावना कुछ अपने पुराने दोस्तों और दिनों को याद करके लिखी गयी थी। मगर आप लोग यह नहीं सोचना कि मैं कवि बन गया हूँ।
तुम होती तो ...
जो सपना कल रात संजोया
आज सुबह वो कितना खोया
तुम होती तो ...
कुछ हँसते
कुछ बातें करते
कुछ सुनते कुछ अपनी कहते
तुम होती तो ...
कल जाने हम और कहाँ हो
दुनिया की कश्ती में बेठे
ना जाने किस और रवाँ हो
आज शाम
कितनी बेबस थी
तुम होती तो ...
कुछ लड़ते कुछ गप्पें करते
ये फुर्सत पल कितने दिन के
कट जाते यों हँसते खिलते
तुम होती तो ...
साथ बेठ्ते
मन खिड़की के दर खुल जाते
खुली हवा कुछ अन्दर आती
उमस भरे मन को
थोड़ी रहत मिल जाती
तुम होती तो ...
क्या मालुम कि
तुम कैसे हो
बहुत व्यस्त हो
या मेरी तरहा ही गुमसुम
घुटे घुटे हो कुछ तो बोलो
कोई खबर दो
तुम होती तो ...
हाथ थाम कर
साथ बेठ्ते
फिर आँखो की नमी हमारे
सूखे मन को तर कर जाती
जीवन पर चिक्टीं परतें भी
धुल कर चमक खुशीं ले आती
तुम होती तो ...
आलोक जैन
आज सुबह वो कितना खोया
तुम होती तो ...
कुछ हँसते
कुछ बातें करते
कुछ सुनते कुछ अपनी कहते
तुम होती तो ...
कल जाने हम और कहाँ हो
दुनिया की कश्ती में बेठे
ना जाने किस और रवाँ हो
आज शाम
कितनी बेबस थी
तुम होती तो ...
कुछ लड़ते कुछ गप्पें करते
ये फुर्सत पल कितने दिन के
कट जाते यों हँसते खिलते
तुम होती तो ...
साथ बेठ्ते
मन खिड़की के दर खुल जाते
खुली हवा कुछ अन्दर आती
उमस भरे मन को
थोड़ी रहत मिल जाती
तुम होती तो ...
क्या मालुम कि
तुम कैसे हो
बहुत व्यस्त हो
या मेरी तरहा ही गुमसुम
घुटे घुटे हो कुछ तो बोलो
कोई खबर दो
तुम होती तो ...
हाथ थाम कर
साथ बेठ्ते
फिर आँखो की नमी हमारे
सूखे मन को तर कर जाती
जीवन पर चिक्टीं परतें भी
धुल कर चमक खुशीं ले आती
तुम होती तो ...
आलोक जैन
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